मन की तरंगें समुद्र की लहरों की तरह कभी उठती कभी गिरती, कभी आगे बढ़ती कभी पीछे लौटती हुई मेरे (और शायद सभी के) जीवन को गति देतीं हैं|
इन तरंगों के अनगिनत moods के साथ हम बहतें रहतें हैं, जीवन भर कभी ऊँचाइयों को छूतें हैं तो कभी कहीं खो जाते हैं|
कभी कोई तरंग रौद्र रूप धारण कर ले तो सब कुछ तहस-नहस करने पर उतारू हो जाती है| तो कभी हौले हौले बस उठती-गिरती, बढ़ती-लौटती अपनी स्थिति का आनंद लेना चाहती है|
कभी तो कोई तरंग ख़ुशी और जोश से भरी हुई, उछलती हुई आगे ही आगे बढ़ती जाएगी| इतने आत्मविश्वास से भरी होगी कि सारी दुनिया को जीत ले| कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती, किनारे पर यह अपना निशान जरूर बनाएगी|
तो कभी उदास होकर, अपनी हार से शर्मसार होकर, पीछे की तरफ लौटेगी| इसमें कोई उत्साह नहीं होगा और ना ही वह वेग होगा| बस धीमी गति से अपने आप में ही समा जाएगी|
पर तब भी ये ख़त्म नहीं होती| अंतर में कुछ तो ऐसा है, जो उसे विलीन नहीं होने देता| कितनी ही पीछे क्यों ना हो, वो फिर एक नए विश्वास से, नया रूप लेकर, चल पड़ती है - आगे की ओर - नए चिन्ह बनाने|
यह क्रम, इसी तरह चलता रहता है और हमेशा चलता रहेगा--
जरूरी यह है कि कोई उदासी इतनी गहरी ना हो कि फिर वह उमंग से भरी लहर का रूप ना ले पाए|
जरूरी यह है कि चाहे कितनी ही तरंगें मिट जाएँ -आगे ना बढ़ पाएँ पर कुछ तो ऐसीं हों जो किनारे पर अपना निशान छोड़ जाएँ|